
सिरसा से सांसद कुमारी शैलजा ने कहा कि 2024-25 के लिए ग्रामीण विकास निधि का 82 प्रतिशत हिस्सा खर्च नहीं किया गया। इससे साफ पता चलता है कि ग्रामीण और गरीबी उन्मूलन परियोजनाओं के लिए निर्धारित धन कागजों में ही पड़ा हुआ है। बजट तो तय हुआ, लेकिन उसका इस्तेमाल क्यों नहीं हुआ? हर साल प्रशासन शानदार वादे करता है, विचारों की रूपरेखा तैयार करता है, लेकिन जब वास्तविक क्रियान्वयन की बात आती है तो आंकड़े कुछ और ही कहानी बयां करते हैं।
संसदीय रिपोर्ट में कहा गया है:
प्रधानमंत्री आवास योजना (ग्रामीण): 15,825 करोड़ खर्च नहीं हुआ
यह प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना है: ₹3545. 77 करोड़ बिना इस्तमाल के रह गया
राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम: ₹1,813. 34 करोड़ आवंटित नहीं किए गए।
राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन: ₹2,583.00. 16 करोड़ खर्च ही नहीं हुआ
मनरेगा: 1627 रुपये। 65 करोड़ खर्च नहीं हुए।
दीनदयाल उपाध्याय-ग्रामीण कौशल योजना परियोजनाओं पर 1,313 रुपये खर्च होंगे।
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ग्रामीण विकास के नाम पर सिर्फ़ दिखावा
ग्रामीण विकास के नाम पर पर झूठे प्रचार करने पर कुमारी शेल्जा ने सरकार को आड़े हाथो लिया। कुमारी शैलजा ने कहा कि भाजपा सरकार प्रचार में माहिर है, लेकिन हकीकत में इसका उल्टा है। विकास केवल भाषणों में होता है, लेकिन सच्चाई यह है कि चुप्पी ही राज करती है। परियोजनाओं के लिए निर्धारित लेकिन जमीनी स्तर पर वितरित नहीं किए गए धन का लाभ किसे मिल रहा है? सरकार ने मनरेगा जैसी चीज को भी नजरअंदाज कर दिया, जो ग्रामीण बेरोजगारों के लिए बड़ी मदद हो सकती थी। ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन को बेहतर बनाने के लिए प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना और प्रधानमंत्री आवास योजना भी उतनी ही महत्वपूर्ण थी, लेकिन इन परियोजनाओं के लिए आवंटित सभी धन खर्च नहीं किए गए। क्या केवल एक छोटी सी वृद्धि से समस्या हल हो जाती है?
क्या मामूली बढ़ोतरी से निकलेगा हल
संसदीय समिति ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए केवल 2 प्रतिशत की मामूली वृद्धि की घोषणा की। ग्रामीण विकास बजट में 27 प्रतिशत की हिस्सेदारी थी। सरकार ने इसे बढ़ाकर ₹1,88,754 कर दिया है। 53 मिलियन ₹1,84,566 से अलग होगा। 2024-25 तक 19 करोड़। यह मामूली वृद्धि गांव के विकास को आगे बढ़ाने में कैसे मदद करती है?
क्या भाजपा सरकार की प्राथमिकता सही ?
सरकार का ग्रामीण विकास हमेशा कागजी कार्रवाई तक ही सीमित रहेगा, इसलिए सरकार को अपनी सर्वोच्च प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए। क्या भाजपा के प्रशासन के पास सही प्राथमिकताएं हैं? कुमारी शैलजा का तर्क है कि कार्यान्वयन के स्तर पर सरकार केवल बड़ी परियोजनाएं पेश करती है, लेकिन वास्तव में काम नहीं करती है। जब ग्रामीण विकास के लिए निर्धारित बजट का कुशलतापूर्वक उपयोग नहीं किया जाता है, तो सरकार की मंशा सवालों के घेरे में आ जाती है।