
एक बार फिर Rupee के प्रतीक चिन्ह ₹ चर्चा में है। इस बार विवाद की शुरुआत तमिलनाडु की एक प्रमुख क्षेत्रीय पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) ने की है। पार्टी का कहना है कि यह प्रतीक चिह्न हिंदी और देवनागरी लिपि को प्राथमिकता देता है और इस तरह कई भारतीय भाषाओं और रीति-रिवाजों के बीच दक्षिण भारतीय पहचान को नज़रअंदाज़ करता है। लेकिन क्या यह वास्तव में भाषा और संस्कृति का मामला है, या इसमें कोई राजनीतिक नौटंकी शामिल है?
Rupee के बारे में वास्तविकता क्या है?
Rupee के इस प्रतीक को उदय कुमार धरणी ने 2010 में वे उस समय IIT गुवाहाटी में कार्यरत थे उन्होंने बताया कि प्रतीक चिन्ह ₹ को देवनागरी “R” और रोमन “R” से प्रेरित होकर डिज़ाइन किया गया है। इसका उद्देश्य भारतीय संस्कृति को अंतर्राष्ट्रीय पहचान के साथ एकीकृत करना था। लेकिन डीएमके और अन्य दक्षिण भारतीय राजनीतिक दलों का मानना है कि यह चिह्न केवल हिंदी को ही प्रमुखता देता है।
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डीएमके की सोच
डीएमके का तर्क है कि भारत एक बहुभाषी देश है और यहां मुद्रा का चिह्न ऐसा होना चाहिए जो सभी भाषाओं और संस्कृतियों को समान सम्मान प्रदान करे। उनके अनुसार, ₹ में केवल देवनागरी “आर” रखकर केंद्र सरकार ने दक्षिण भारतीय भावनाओं को बदनाम किया है। लेकिन क्या यह तर्क पूरी तरह से वैध है? बिल्कुल नहीं। यह चिह्न केवल एक भाषा का प्रतीक नहीं है, बल्कि यह पूरे राष्ट्र की आर्थिक पहचान का अभिन्न अंग बन गया है।
तमिल पहचान की प्राचीन धुन
डीएमके द्वारा हिंदी का विरोध कोई नई बात नहीं है। 1960 के दशक में जब हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में अपनाने का मुद्दा उठा, तो तमिलनाडु में बड़े पैमाने पर आंदोलन हुए। तब से डीएमके तमिल पहचान को बनाए रखने और केंद्र द्वारा “हिंदी थोपने” के खिलाफ संघर्ष कर रही है। अब ₹ चिह्न का विरोध भी उसी पुराने एजेंडे का हिस्सा लगता है।
राजनीति या पहचान की लड़ाई?
ज्यादातर लोगों का मानना है कि यह मुद्दा भाषाई से ज्यादा राजनीति से प्रेरित है। डीएमके ऐसा करके तमिलनाडु में अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है। साथ ही, वह केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा को “हिंदी वर्चस्व” का दोषी ठहराकर उसे घेरने की कोशिश कर रही है। यह दक्षिण भारत बनाम उत्तर भारत की भावना को हवा देने की कोशिश भी हो सकती है।
2026 में विधानसभा चुनावी मुद्दा
तमिलनाडु में 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन परिस्थितियों में डीएमके अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं को यह दिखाना चाहती है कि वह तमिल पहचान को बचाए रखने के लिए कुछ भी कर सकती है। इसके अलावा, वह केरल, कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे दक्षिण भारतीय राज्यों में भी अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर सकता है, जहां हिंदी थोपने का विरोध पहले से ही चल रहा है।