
हरियाणा के जींद-सोनीपत रेल लाइन पर हाइड्रोजन ट्रेन का इंतजार कर रहे यात्रियों को रेलवे ने एक बार फिर निराश कर दिया . क्योकि एक बार फिर से तय ट्रायल नहीं हुआ। वजह? जींद और नरवाना स्टेशनों पर कई तकनीकी कमियां हैं, जिनसे इस महत्वाकांक्षा को हकीकत बनने में वक्त लगेगा।
रेलवे ने क्यों टाला ट्रायल
रेलवे अधिकारियो की माने तो हाइड्रोजन ट्रेन चलाने के लिए हाइड्रोजन गैस बनाने के लिए रोजाना 4000 लीटर पानी की जरूरत होती है। फिर भी जांच में पता चला कि जींद जंक्शन पर पानी की व्यवस्था अधूरी है। हाइड्रोजन प्लांट में भरपूर पानी होने के बावजूद भी रेलवे के लिए यह बड़ी मुश्किल साबित हुआ। नई दिल्ली मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) पुष्पेंद्र त्रिपाठी ने कर्मचारियों को फटकार लगाई और इस समस्या को दूर करने के लिए 20 मई की डेडलाइन तय की। यह तो वक्त ही बताएगा कि कुछ वाकई समय पर होगा या नहीं!
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ट्रायल टलने से बढ़ी चिंता
मंगलवार को गोहाना -जींद में हाइड्रोजन ट्रेन का परीक्षण होना था। सभी तैयार थे, लेकिन जरूरी उपकरणों की कमी के कारण ग्यारहवीं बार काम धीमा पड़ गया। ट्रेन की गति इतनी धीमी थी कि आगे-पीछे मुड़ने वाले यात्रियों को डर लगा रहता था कि कहीं ट्रेन बीच में ही न रुक जाए। कुल मिलाकर, देरी बढ़ती ही चली गई।
डीआरएम का दौरा और शौचालय देख भडके
नई दिल्ली से पंजाब के कटार सिंह वाला स्टेशन तक डीआरएम पुष्पेंद्र त्रिपाठी सोमवार को गए। रास्ते में वे जींद और नरवाना स्टेशनों पर रुके और वहां चल रही बिल्डिंग परियोजनाओं का निरीक्षण किया। हालांकि डीआरएम ने आपत्ति जताई, लेकिन जींद में यूरोपियन स्टाइल की टॉयलेट सीटें लगाई जा रही थीं। उन्होंने साफ कहा, “एक यूरोपीय कुर्सी पर्याप्त है, भारतीय कुर्सी को छोड़ दें। इसके अलावा हाइड्रोजन प्लांट की सुरक्षा को लेकर भी समस्याएं सामने आईं। उन्होंने विस्फोट की प्रतिक्रिया के बारे में भी पूछा। अधिकारियों ने सभी तरह की आपदाओं से निपटने के लिए अलार्म और फायर हाइड्रेंट सिस्टम की तैयारियों का आश्वासन दिया।
कर्मचारियों की सुनी समस्या
जींद शाखा की उत्तर रेलवे पुरुष शाखा ने भी शिकायत की। रोजाना दुर्घटनाओं के कारण यूनियन के सचिव मेहर सिंह ने कहा कि ट्रैकमैन कर्मियों के पास सुरक्षा उपकरण नहीं हैं। लोको पायलट और ट्रेनिंग मैनेजरों को रनिंग रूम तक पहुंचने के लिए रेलवे जंक्शन पर ट्रेनों के नीचे से रेंगना पड़ता है। ऐसे में यूनियन ने रनिंग रूम से प्लेटफार्म नंबर 1 तक फुटओवर ब्रिज की मांग की। गाड़ी में बैठे लोगों का इलाज किया जाएगा। हाइड्रोजन ट्रेन का सपना अभी भी अधूरा है। न तो खामियों को दूर किया जा रहा है और न ही सुनवाई के लिए कोई निश्चित तिथि तय की गई है।
यात्रियों की उम्मीदें अब सिर्फ कागजों तक ही सीमित नजर आ रही हैं। महज वादों से आगे बढ़कर रेलवे को इस तरह काम करना होगा जिससे यात्रा और अधिक सुरक्षित और सरल हो। तब तक तो बस इंतजार ही है!