
नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में बच्चों की मुस्कान ही नहीं, अभिभावकों की चिंताएं भी बढ़ जाती हैं। इसका कारण निजी स्कूलों की लूट और मनमानी है। मनमानी का ये खेल हरियाणा में ही नहीं ,बलिक पुरे देश में आम बात है. लेकिन सरकार इस पर मूकदर्शक बनी हुई है।
निजी स्कूलों के हाथों लुटते परिजन
निजी स्कूलों में शैक्षणिक सत्र की शुरुआत हो गई है। निजी स्कूलों की मनमानी पर सांसद कुमारी शैलजा ने खुलकर विरोध किया। सांसद कुमारी शैलजा के बयान के समर्थन में अभिभावक भी खुलकर आए। है निजी स्कूलों में अपने बच्चे के बेहतर भविष्य की गारंटी के लिए परिजन स्कूल द्वारा निर्धारित दुकानों पर सालाना कई हजार रुपये खर्च करते हैं। जबकि तय दुकानों से दोगुनी या तिगुनी कीमत पर किताबें, यूनिफॉर्म और नोटबुक मिलती हैं।
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कैसे चलता मिली भगती का धंधा?
निजी स्कूल और प्रकाशकों मिलीभगत से से सभी वाकिफ़ है। निजी स्कूल और प्रकाशक अपने हित के लिए किताब के एक पन्ने को बदलवाकर उसकी जगह दूसरी किताब बाजार में लाते है, जिससे पुरानी किताबें बेकार हो जाती हैं. हालांकि एनसीईआरटी की किताबें सस्ती हैं, लेकिन इन पर कमीशन नहीं मिलता; इसलिए, स्कूल निजी प्रकाशकों की किताबों पर निर्भर रहते हैं।
अभिभावक: शक्तिहीन या मजबूर
हालाँकि अब तक किसी भी बड़े स्कूल के खिलाफ कोई महत्वपूर्ण कार्रवाई नहीं की गई है. लेकिन जब अभिभावक विरोध करते हैं तो उनको कार्रवाई के नाम पर झूठी तस्सली दी जाती है। इससे पता चलता है कि शिक्षा क्षेत्र में चल रहे इस खेल को को बदलने की सिस्टम कोई इच्छा नहीं है।
मनमानी कीमतों में उलझे सपने
मौजूदा समय में सबसे हैरत की बात तो ये है , जितनी छोटी कक्षा उतनी ही महंगी किताबें; क्या आपको पता है कि नर्सरी कक्षा के लिए कॉपीबुक का एक सेट 3400 रुपये तक चल सकता है, जो आठवीं कक्षा तक 7800 रुपये तक बढ़ जाता है? यह एक मनोवैज्ञानिक तनाव है, अभिभावक इस चिंता में लुटते रहते हैं- “बच्चे का भविष्य दांव पर है।
सरकारी स्कूलों के हालत सुधरे तो ……
कुमारी शैलजा ने कहा है कि यदि सरकारी स्कूलों की स्थिति सुधर जाए तो शायद लोगों को निजी स्कूलों की ओर जाने की चिंता न करनी पड़े। सरकार को शिक्षा को लाभ का साधन नहीं बल्कि जिम्मेदारी समझना चाहिए।